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Heritage & Architectural Wonder

बाथू की लड़ी: हिमाचल का पानी में डूबने वाला अनोखा मंदिर

बाथू की लड़ी प्रकृति और आस्था का एक ऐसा बेजोड़ संगम है, जिसे जीवन में एक बार देखना हर किसी के लिए एक यादगार अनुभव बन जाता है ।

By Prerak "प्रेरक" 1 min read

Bathu Ladi Submerged

भौगोलिकस्थितिऔरपोंगबांधकाअनोखाचक्र

हिमाचल प्रदेश के खूबसूरत कांगड़ा जिले में 'बाथू की लड़ी' नाम का एक बहुत ही सुंदर और रहस्यमयी मंदिर स्थित है । स्थानीय भाषा में 'लड़ी' का मतलब 'माला' या 'कड़ी' होता है । यह मंदिर जवाली शहर के पास, धमेता गांव से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर महाराणा प्रताप सागर के बीच स्थित है । इस विशाल जलाशय को आमतौर पर पोंग बांध (Pong Dam) के नाम से जाना जाता है, जिसे 1970 के दशक में ब्यास नदी पर बनाया गया था ।

बांध के बनने से इस ऐतिहासिक मंदिर का पूरा भूगोल बदल गया । अब यह मंदिर साल के लगभग 8 महीने पूरी तरह से पानी में डूबा रहता है । केवल गर्मी के महीनों में (आमतौर पर मार्च से जून के बीच), जब जलाशय का पानी सूखने लगता है, यह मंदिर धीरे-धीरे पानी से बाहर निकल आता है । पानी के घटने-बढ़ने के इस चक्र ने यहाँ एक अद्भुत और रहस्यमयी माहौल बना दिया है ।

महाराणाप्रतापसागर (पोंगबांध)

सर्दियां और मानसून (8 महीने)

गर्मी का मौसम (मार्च-जून)

मंदिर पूरी तरह पानी में डूबा रहता है।

पानी का स्तर काफी कम हो जाता है।

केवल ऊंचे पत्थर के खंभे दिखाई देते हैं।

मंदिर का पूरा ढांचा बाहर आ जाता है।

यहाँ केवल नाव से ही पहुंचा जा सकता है।

सूखी जमीन पर चलकर या गाड़ी से जा सकते हैं।

गर्मी के दिनों में जहाँ दूर-दूर तक हरी-भरी घास के मैदान नजर आते हैं, वहीं सर्दियों में यह पूरा इलाका एक विशाल नीले समंदर जैसा दिखने लगता है । इस जलाशय के किनारे कई छोटे-छोटे पारंपरिक हिमाचली गांव बसे हैं, जिनका जीवन पोंग बांध के इस पानी के उतार-चढ़ाव से करीब से जुड़ा हुआ है ।

गांवकानाम

दूरी

भूमिका / महत्व

धमेता

3 किमी

मुख्य सड़क मार्ग और नाव शुरू होने का स्थान

नगरोटा सूरियां

3 किमी

रेलवे स्टेशन और नाव की सुविधा

जवाली

13 किमी

नजदीकी कस्बा और ट्रेन स्टेशन

गुगलारा

पास ही

स्थानीय कृषि प्रधान गांव

सुगनारा

पास ही

जलस्तर की निगरानी करने वाला गांव

हरसर

पास ही

स्थानीय नाविकों का क्षेत्र

जरोत

पास ही

बांध के सुंदर दृश्य वाला गांव

इतिहासऔरपौराणिकमान्यताएं: राजाओंकीकलायापांडवोंकीसीढ़ी?

बाथू की लड़ी के इतिहास को लेकर इतिहासकारों और स्थानीय लोगों के बीच अलग-अलग कहानियां और मान्यताएं हैं :

                                 निर्माण से जुड़ी मान्यताएं

पौराणिक कथा (पांडव काल)                                               

ऐतिहासिक प्रमाण (8वीं शताब्दी)

पांडवों ने अज्ञातवास में बनाया                         

हिंदू शाही राजवंश द्वारा निर्मित

एक रात में स्वर्ग की सीढ़ी का प्रयास                  

कुछ राजा हरिचंद गुलरिया से भी जोड़ते हैं

 पांडवोंकीकथाऔर'स्वर्गकीसीढ़ी'

स्थानीय लोगों का पक्का विश्वास है कि इस मंदिर को महाभारत काल में पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान बनाया था । लोक कथाओं के अनुसार, पांडवों ने इसी स्थान पर एक ही रात में स्वर्ग जाने के लिए एक सीढ़ी बनाने की कोशिश की थी । लेकिन सुबह जल्दी हो जाने के कारण वे काम पूरा नहीं कर पाए । मंदिर परिसर में आज भी पत्थर की 40 सीढ़ियां बनी हुई हैं जो सीधे हवा में जाकर खत्म हो जाती हैं, जिन्हें स्थानीय लोग आज भी 'स्वर्ग की सीढ़ी' मानते हैं ।

ऐतिहासिकतथ्यऔरराजाओंकायोगदान

इतिहासकारों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी में हिंदू शाही राजवंश के शासनकाल के दौरान हुआ था । इस समय हिमाचल में नगाड़ा शैली (Nagara style) के पत्थर के मंदिरों का निर्माण बहुत लोकप्रिय था ।

एक अन्य कहानी के अनुसार, हरिपुर-गुलेर रियासत के राजा हरिचंद गुलरिया ने 14वीं से 16वीं शताब्दी के बीच इसका निर्माण करवाया था । इस क्षेत्र में बने अन्य किलों (जैसे नूरपुर और कोटला के किले) में भी ठीक इसी प्रकार के पत्थरों और कलाकारी का उपयोग किया गया है ।

नागरवास्तुकलाऔर'बाथू' पत्थरकाचमत्कार

इस मंदिर की सबसे बड़ी खूबी इसकी मजबूती है । पिछले 50 से अधिक सालों से हर साल महीनों पानी के अंदर डूबे रहने के बावजूद यह मंदिर आज भी वैसा का वैसा ही खड़ा है ।

एककतारमेंबनेमंदिर (मालाकीतरह) !! विष्णुमंदिर !! विष्णुमंदिर !! विष्णुमंदिर !! विष्णुमंदिर !! विष्णुमंदिर !! मुख्यगर्भगृह !! (शिव-पार्वती)|

मालाजैसीअनूठीबनावट

इस मंदिर का नाम 'बाथू की लड़ी' इसलिए पड़ा क्योंकि यहाँ 6 मुख्य मंदिर एक सीधी कतार (माला की तरह) में बने हुए हैं । इस कतार के बीचों-बीच मुख्य मंदिर है, जो भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है । इसके आसपास बने 5 अन्य मंदिर भगवान विष्णु के हैं । मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार और दीवारों पर भगवान गणेश, हनुमान, मां काली और शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु की बहुत ही सुंदर नक्काशी की गई है ।

बाथूपत्थरकीमजबूती

इस मंदिर को बनाने में जिस स्थानीय पत्थर का इस्तेमाल किया गया है, उसे 'बाथू पत्थर' कहा जाता है । वैज्ञानिक दृष्टि से यह एक बेहद मजबूत सैंडस्टोन (बलुआ पत्थर) है, जिसमें चूने की मात्रा होती है । इस पत्थर की खासियतें निम्नलिखित हैं:

  • कमसोखनेकीक्षमता: यह पत्थर पानी को अंदर नहीं सोखता, जिससे यह पानी में रहने पर भी अंदर से कमजोर नहीं होता ।
  • तापमानसहनेकीशक्ति: गर्मियों में जब धूप में यहाँ का तापमान 32°C तक पहुँच जाता है, तब भी यह पत्थर टूटता या चटकता नहीं है ।
  • नक्काशीकेअनुकूल: मजबूत होने के साथ-साथ प्राचीन कलाकारों ने इस पर बहुत ही बारीक और सुंदर देवी-देवताओं की मूर्तियां उकेरी हैं ।

इसके अलावा, यहाँ मुख्य मंदिर के पास पत्थर का एक बड़ा खंभा (Pillar) बना हुआ है । इस खंभे के अंदर घुमावदार सीढ़ियां बनी हैं । जब पूरा मंदिर पानी में डूब जाता है, तब केवल यह खंभा पानी के ऊपर दिखाई देता है । इस पर चढ़कर पोंग बांध का 360-डिग्री का नजारा देखा जा सकता है ।

यहाँकैसेपहुँचे? (यात्रीगाइड)

बाथू की लड़ी पहुँचने के लिए मौसम और पानी के स्तर के हिसाब से अपनी यात्रा की योजना बनानी चाहिए :

  • हवाईमार्ग: सबसे नजदीकी हवाई अड्डा धर्मशाला का गगल (Gaggal) एयरपोर्ट है, जो यहाँ से करीब 55-60 किलोमीटर दूर है ।
  • रेलमार्ग: पठानकोट रेलवे स्टेशन यहाँ का मुख्य ब्रॉड गेज स्टेशन है । आप पठानकोट से ऐतिहासिक 'कांगड़ा वैली टॉय ट्रेन' (खिलौना गाड़ी) पकड़कर जवाली रेलवे स्टेशन तक आ सकते हैं, जो बहुत ही सुंदर पहाड़ों से होकर गुजरती है ।
  • सड़कऔरनावमार्ग:
    • गर्मीकामौसम (मार्चसेजून): जब पानी पूरी तरह सूख जाता है, तो आप धमेता या जवाली से कच्ची सड़कों के रास्ते सीधे गाड़ी से मंदिर तक पहुँच सकते हैं ।
    • अन्यमौसम (जुलाईसेफरवरी): जब मंदिर पानी में डूब जाता है, तब आपको धमेता या नगरोटा सूरियां से स्थानीय नाविकों की मदद से नाव (बोट) लेकर मंदिर तक जाना पड़ता है ।

प्रकृतिकावरदान: प्रवासीपक्षीऔरशांतद्वीप

बाथू की लड़ी केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह प्रकृति प्रेमियों के लिए एक अद्भुत स्वर्ग है ।

यह मंदिर पोंग बांध वन्यजीव अभयारण्य के अंतर्गत आता है । हर साल सर्दियों के मौसम में यहाँ तिब्बत, साइबेरिया और मध्य एशिया से लाखों प्रवासी पक्षी आते हैं । यहाँ पक्षियों की 200 से अधिक प्रजातियां देखी जा सकती हैं, जिनमें दुनिया की सबसे ऊँची उड़ान भरने वाली 'बार-हेडेड गूज' (Bar-headed geese) बत्तखें भी शामिल हैं । मंदिर के आधे डूबे पत्थरों और खंभों पर विश्राम करते इन रंग-बिरंगे पक्षियों को देखना आँखों को बहुत सुकून देता है ।

ठहरनेकेविकल्प:

  • रेनसरद्वीपफॉरेस्टगेस्टहाउस: बांध के ठीक बीच में एक खूबसूरत टापू (Rensar Island) है । यहाँ वन विभाग का एक सुंदर विश्राम गृह है, जहाँ रुकने के लिए आपको हिमाचल प्रदेश इको-टूरिज्म सोसाइटी से पहले बुकिंग करानी होती है ।
  • राडबालीरिट्रीट: यह डेहरा के पास जंगलों के बीच बसा एक शांत इको-रिज़ॉर्ट है, जो प्रामाणिक हिमाचली भोजन और प्रकृति की सैर का अनुभव कराता है ।

यात्रियोंकेलिएकुछजरूरीटिप्सऔरसंरक्षणकीपुकार

अगर आप बाथू की लड़ी जाने की सोच रहे हैं, तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें:

1.    कोईदुकानेंनहींहैं: मंदिर के आसपास खाने-पीने या पानी की कोई भी दुकान नहीं है । इसलिए अपने साथ पानी की बोतल और जरूरी नाश्ता जरूर ले जाएं ।

2.    स्थानीयलोगोंसेपूछें: यात्रा शुरू करने से पहले धमेता या जवाली के स्थानीय लोगों से पानी के स्तर के बारे में जरूर पूछ लें कि रास्ता पैदल जाने योग्य है या नाव की जरूरत पड़ेगी ।

3.    मंदिरकीगरिमा: यहाँ कोई पक्के पुजारी नहीं होते, श्रद्धालु स्वयं पूजा-अर्चना करते हैं । मंदिर परिसर में सादे और पारंपरिक कपड़े पहनकर ही जाएं ।

संरक्षणकीआवश्यकता: आज यह ऐतिहासिक धरोहर सरकारी अनदेखी और पर्यटकों की लापरवाही के कारण संकट में है । कुछ लोग बिना सोचे-समझे कमजोर हो चुकी प्राचीन मूर्तियों और खंभों पर चढ़ जाते हैं, जिससे पत्थरों को नुकसान पहुँचता है । आईएनटीएसीएच (INTACH) जैसी सांस्कृतिक संस्थाओं ने मांग की है कि इस 1200 साल पुराने ऐतिहासिक मंदिर को सुरक्षित बचाने के लिए इसके पत्थरों को धीरे-धीरे किसी ऊंचे स्थान पर ले जाकर पुनर्स्थापित किया जाए ।

Written by

Prerak "प्रेरक"

Dr. Pankaj Singh Chandel, fondly known as Prerak “प्रेरक,” is an academic leader and tourism professional with a strong focus on hospitality, wellness, and spiritual tourism. He holds a PhD in Tourism Management and has contributed to teaching, research, and academic leadership across higher education. His work includes sustainable tourism, homestay development, and content creation for tourism and education. He also plays an active role in conference organization, entrepreneurial initiatives, and community-oriented projects. He is known for blending academic insight with practical tourism experience, inspiring students and professionals through his visionary approach

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