Festival & Utsav
Dussehra Festival in India : Celebrations in Almora, Kullu, and Mysore
Dussehra, also known as Vijayadashami, is one of India’s most celebrated festivals, symbolizing the victory of good over evil. This article explains the meaning of Dussehra, its connection with Navratri, Ramayana, and the defeat of Mahishasura, along with traditional customs followed across Indian states.
Dussehra Festival in India
दशहरा को विजयदशमी भी कहा जाता है
‘विजय' का अर्थ है जीत और 'दशमी' चंद्रमा के चक्र की शुक्ल पक्ष की दशवी तिथि है, इसलिए विजयदशमी का अर्थ है कि नए चंद्रमा से दसवें दिन किसी भी सकारात्मक कार्य में जीत सुनिश्चित होगी । दशहरा, एक महत्वपूर्ण हिंदू त्यौहार है जिसे भारत और नेपाल में विभिन्न विधियों से मनाया जाता है । दशहरा या दस - हारा, 'दस' रावण को सम्बोधित करता है क्योंकि रावण को दशानन्द भी कहा जाता है 'हारा' का अर्थ है युद्ध में हार । तो दशहरा या दस -हारा वह दिन है जब रावण को भगवान राम से युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था ।
इसके अतरिक्त, दशा का अर्थ है कुछ विशिष्ट अवधि या समय चक्र भी है और हारा का अर्थ लुप्त हो जाना है, इसलिए इस अर्थ के अनुसार दासा-हारा या दशा हारा का अर्थ वो अवधि है जिसमें नकारात्मकता सकारात्मकता से पराजित होती है इसके अतरिक्त, यह दिन राक्षस महिषासुर पर देवी दुर्गा की जीत को चिह्नित करता है महिष का अर्थ है पानी में रहने वाला भैंसा और असुर का अर्थ दानव है । देवी दस दिनों और नौ रातों तक बुराई से लड़ी और दसवें दिन महिषासुर का वध किया । यह नौ रात्रि ही नवरात्री के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है।
भारत के जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड और बिहार राज्यों में नवरात्रि के पहले दिन मिट्टी के बर्तनों में ‘जौ’ लगाने की परंपरा है । नवरात्रि हिंदू देवी दुर्गा की पूजा के लिए समर्पित एक त्यौहार है । नवरात्रि का अर्थ है ‘नव’ अर्थ नौ 9 और ‘रात्रि’ अर्थ रात्रि इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है । दसवें दिन को सामान्यतः विजयदाशमी या दशहरा कहा जाता है । दशहरा के दिन, नौ दिन के अंकुरित जौ (जिसे नौरते कहा जाता है) को भाग्य के लिए उपयोग किया जाता है; बहनें एवं घर की अन्य स्त्रियाँ इन नौरतो को पुरुषों के कानों के पीछे रख देती है इसी दिन लोग इन नौरतो को रावण के पुतले के पैरों पर भी चढ़ाते हैं । नवरात्रि और दशहरा पर रामायण (रामलीला) पर आधारित नाटकों को लोग खुले मैदान में करते हैं एवं मेले भी लगाए जाते हैं, और रावण (प्राचीन श्रीलंका का एक राक्षस राजा), मेघनाथ एवं कुम्भकर्ण के पुतले लगाए जाते हैं। शाम को भगवान राम का रूप लिए हुए व्यक्ति द्वारा पुतले जला दिये जाते हैं ।
दशहरा के बाद, वातावरण की गर्मी समाप्त होती है (विशेष रूप से उत्तर भारत में) और ठंड के मौसम की शुरुआत होती है । पुतलों के अंदर भरी आतिशबाजी में फॉस्फोरस होता है, माना जाता है कि फॉस्फोरस का जलना वायुमंडल को शुद्ध करता है ।
अल्मोड़ा (उत्तराखंड) का दशहरा उत्सव पूरे कुमाऊँ क्षेत्र में अपनी अनोखी परंपरा और भव्यता के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ का दशहरा सिर्फ़ धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोक संस्कृति, कला और सामाजिक मेल-मिलाप का भी बड़ा पर्व माना जाता है।
अल्मोड़ादशहरेकीविशेषताएँ:
रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण की झाँकियाँ और पुतले
- यहाँ दशहरे पर बड़े-बड़े पुतले बनाए जाते हैं। खास बात यह है कि ये पुतले सिर्फ़ रावण के नहीं, बल्कि मेघनाथ और कुंभकर्ण के भी होते हैं।
- पुतले बनाने की परंपरा ब्रिटिश काल से चली आ रही है, और इन्हें बनाने में स्थानीय कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।
झाँकियाँ और शोभायात्राएँ
- विजयादशमी के दिन विभिन्न मोहल्लों और गाँवों से झाँकियाँ निकलती हैं। इनमें धार्मिक, सामाजिक और समसामयिक विषयों पर संदेश भी शामिल रहते हैं।
- ये झाँकियाँ रंग-बिरंगे परिधानों, लोकनृत्यों और लोकगीतों के साथ निकलती हैं, जो इसे और भी आकर्षक बनाती हैं।
पुतला दहन
- शोभायात्रा के बाद मैदान में इन विशाल पुतलों का दहन किया जाता है।
- पुतला दहन को बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, और इसमें स्थानीय जनता बड़ी संख्या में शामिल होती है।
सांस्कृतिक उत्सव
- दशहरे के अवसर पर नाटक, रामलीला, लोकगीत, और नृत्य भी आयोजित किए जाते हैं।
- रामलीला का मंचन अल्मोड़ा में ऐतिहासिक महत्व रखता है, और यह भी दशहरे का प्रमुख आकर्षण होता है।
सामाजिक एकता
- यह पर्व सिर्फ धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने और एकता का प्रतीक भी है। विभिन्न समुदाय इसमें मिलकर भाग लेते हैं।
हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी का दशहरा पूरे देश और विदेश में प्रसिद्ध है। इसकी विशेषता यह है कि यहाँ का दशहरा सामान्य दशहरे से अलग होता है, क्योंकि यहाँ रावण-दहन नहीं किया जाता। बल्कि यह पर्व देवताओं के मिलन, भव्य शोभायात्राओं और सांस्कृतिक मेलों के लिए जाना जाता है।
कुल्लूदशहरेकीप्रमुखविशेषताएँ:

समय और अवधि
- कुल्लू का दशहरा विजयादशमी के दिन से शुरू होता है और सात दिनों तक चलता है।
- इसे कुल्लू की “राजा की ऐतिहासिक रथ यात्रा” के नाम से भी जाना जाता है।
भगवान रघुनाथ जी की पूजा
- इस उत्सव का केंद्र भगवान रघुनाथ जी (श्रीराम) हैं।
- 17वीं शताब्दी में राजा जगत सिंह ने भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति अयोध्या से मंगवाकर कुल्लू में स्थापित की थी। तभी से दशहरे का आरंभ भगवान रघुनाथ जी की पूजा से होता है।
रथ यात्रा और देवताओं का आगमन
- कुल्लू घाटी के विभिन्न गाँवों और क्षेत्रों से सैकड़ों देवता और देवियाँ अपने-अपने रथों और पालकियों में यहाँ पधारते हैं।
- देवताओं की यह संगति देव मिलन कहलाती है, और इसे पूरे हिमालयी क्षेत्र की अनूठी परंपरा माना जाता है।
- भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति को सजाए गए रथ पर विराजमान किया जाता है और हजारों श्रद्धालु रस्सियाँ खींचकर रथ यात्रा निकालते हैं।
सांस्कृतिक कार्यक्रम और मेला
- इस दौरान घाटी में लोकनृत्य, लोकगीत, संगीत, नाट्य, और हस्तशिल्प प्रदर्शनी आयोजित होती है।
- यह मेला राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करता है, इसलिए इसे अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा मेला भी कहा जाता है।
रावण दहन का अभाव
- कुल्लू दशहरे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतले नहीं जलाए जाते।
- यहाँ दशहरा देव संस्कृति, लोक परंपरा और भाईचारे का प्रतीक है।
समापन
- सातवें दिन, भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति को व्यास नदी के किनारे ले जाया जाता है।
- वहाँ एक विशेष यज्ञ होता है जिसे लंकादहन यज्ञ कहा जाता है। उसके बाद देवताओं को उनके-अपने गाँव वापस भेजा जाता है।
मैसूर का दशहरा (मैसूरु दशहरा) दक्षिण भारत (कर्नाटक) का सबसे भव्य और ऐतिहासिक उत्सव है। यह नवरात्रि और विजयादशमी के अवसर पर मनाया जाता है और इसे “नाडहब्बा” (राज्य पर्व) कहा जाता है।
मैसूरदशहरेकीविशेषताएँ
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- मैसूर दशहरे की शुरुआत 15वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य के समय से मानी जाती है।
- बाद में वाडियार वंश (Wodeyar dynasty) ने इसे और भव्य रूप दिया।
- यह परंपरा सैकड़ों साल से चली आ रही है और आज भी उसी शान से मनाई जाती है।
देवी चामुंडेश्वरी की पूजा
- इस उत्सव का केंद्र बिंदु देवी चामुंडेश्वरी (माँ दुर्गा का रूप) हैं।
- मान्यता है कि माँ चामुंडेश्वरी ने महिषासुर राक्षस का वध किया था, और इसी विजय की स्मृति में मैसूर का नाम पड़ा – महिषासुरु → मैसूरु (Mysuru)।
- पूरे दशहरे में चामुंडी पहाड़ी पर स्थित मंदिर का विशेष महत्व होता है।
मैसूर महल की सजावट
- दशहरे पर मैसूर पैलेस (महल) को हज़ारों बल्बों और दीपों से सजाया जाता है।
- रात के समय यह महल स्वर्ण मंदिर जैसा जगमगाता है और पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण होता है।
“जम्बू सावरी” (भव्य शोभायात्रा)
- विजयादशमी के दिन जम्बू सावरी नामक शोभायात्रा निकाली जाती है।
- इसमें सजी-धजी हाथियों का काफिला, घोड़े, ऊँट, नृत्य-गायक दल, और लोक कलाकार भाग लेते हैं।
- सबसे आगे सजे हुए हाथी पर स्वर्ण हौद (Golden Howdah) में देवी चामुंडेश्वरी की मूर्ति विराजमान रहती है।
- लाखों लोग इस शोभायात्रा को देखने आते हैं।
सांस्कृतिक और लोक उत्सव
- दशहरे के दौरान मैसूर में संगीत, नृत्य, नाटक, लोक कला, हस्तशिल्प प्रदर्शनी, खेलकूद और रथ यात्राएँ आयोजित होती हैं।
- यह उत्सव सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि कला और संस्कृति का उत्सव भी है।
अंतरराष्ट्रीय पहचान
- मैसूर दशहरा की भव्यता के कारण इसे “भारत का महोत्सव” कहा जाता है।
- इसे देखने के लिए भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी पर्यटक आते हैं।
भारत के कई भागो में, नवरात्रि के पहले दिन स्थापित देवताओं को दसवे, दशहरा के दिन जल में प्रवाहित कर दिया जाता है। उपासक एक-दूसरे से मिलते हैं और मिठाई का आदान-प्रदान करते हैं । महाराष्ट्र में परिवारों में दशहरा के त्यौहार के दिन पर अपटा/कठमूली वृक्ष (Bauhinia racemosa, commonly known as the bidi leaf tree) की पत्तियों का आदान-प्रदान करना प्रथागत है । यही कारण है कि वृक्ष को अक्सर सोनपट्टा के रूप में जाना जाता है (शाब्दिक अनुवाद: सोने की पत्तियां) । अपटा की पत्तियों के आदान प्रदान की परंपरा भगवान राम और कुबेरा के पूर्वजों रघुराज का प्रतीक है ।
दशहरा के दिन कारीगरों के समुदाय अपने उपकरणों की पूजा करते हैं, इस दौरान लोकप्रिय केसर रंग के गेंदे का फूल, पूजा और सजावट के लिए उपयोग किया जाता है । ऐसा कहा जाता है कि विजयदशमी पर मुहूर्त या शुभ समय की गणना करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि पूरा दिन ही बहुत शुभ होता है । विवाह जैसी जीवन की भी बड़ी घटनाओं को भी इस दिन बिना मुहूर्त की जाँच किए, सम्पन्न किया जा सकता है ।
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